दिल्ली हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा कि वैवाहिक समझौते के आधार पर गंभीर सेक्सुअल असॉल्ट के आरोपों वाली FIR रद्द नहीं की जा सकती है। कोर्ट ने साफ किया कि अदालत की शक्तियों का इस्तेमाल 'जघन्य और गंभीर आरोपों को दबाने' के लिए नहीं किया जा सकता, भले ही पक्षकार सम्झौते के लिए तैयार हों। जस्टिस गिरीश कठपालिया ने यह टिप्पणी करते हुए आशीष कालरा और अन्य की ओर से दायर याचिका को 5 मई को खारिज कर दिया। याचिका में शाहदरा थाने में दर्ज FIR उससे जुड़ी आपराधिक कार्यवाही खत्म करने की मांग की गई थी।
 

याचिकाकर्ताओं ने क्या कहा

याचिकाकर्ताओं का कहना था कि शिकायतकर्ता और उनके पति के बीच सभी वैवाहिक विवाद सुलझ चुके हैं। इसलिए FIR रद्द कर दी जानी चाहिए। हालांकि, दिल्ली हाईकोर्ट ने शिकायतकर्ता के देवर के खिलाफ लगाए गए आरोपों को अत्यंत गंभीर मानते हुए राहत देने से इनकार कर दिया। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि 24 मई 2020 को देवर उसके कमरे में घुस आया, अश्लील फिल्म चलाई और यौन संबंध बनाने की मांग की।

हर मामले का आकलन तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर -HC

विरोध करने पर उसका नहाने का विडियो वायरल करने की धमकी दी गई। महिला ने यह भी आरोप लगाया कि घटना की जानकारी परिवार को देने पर उसे जान से मारने की धमकी दी गई।

याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि वैवाहिक विवादों में इस तरह के आरोप अक्सर मनगढंत होते हैं। कोर्ट ने कहा कि हर मामले का आकलन उसके तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर किया जाना चाहिए।

हाई कोर्ट ने कहा कि यह केवल वैवाहिक विवाद का मामला नहीं, बल्कि महिला की ओर से अपने देवर के खिलाफ लगाए गए गंभीर आरोप हैं।

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